वैश्वीकरण के अर्थ, स्वरूप एवं महत्त्व का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

प्रशन: निःमनलिखित में से किन्हीं दो पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए:

(अ) मुक्त बाज़ार पूँजीवाब(Free market capitalization)
(ब) द्वांस-राष्ट्रीय निगम(Dawn-National Corporation)
(स) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष(International Monetary Fund)
(द) वैश्वीकरण और नागरिक समाज(Globalization and Civil Society)

उत्तर- मुक्त बाज़ार पूँजीवाब(Free market capitalization)

भारत में भूमंडलीकरण, बाजारीकरण एवं उदारौकरण कौ शब्दाबलियाँ वस्तुत: समाज, अधंव्यवस्था एच ग़जब्यवस्था से संबंधित हैं। भूमंडलीकरण की पूरी प्रक्रिया को अतर्राष्ट्रीय वित्त ने अपन प्रभाव में लिया है जिसके कारण यह स्वयं ही संकट में जूझती हुईं एक प्रक्रिया बन गई है। भारत क ‘िथति पर गौर करें तो यहाँ हम पाते हैं कि घारत में वेश्विकठा ने अपना आकार 1990 के दशक में किए गए आर्थिक शधारों एवं उदारीकरण की प्रक्तिया के फलस्वरूप प्रहण किया। आजकल भारत में आर्थिक डदागीकरण एव पूँजीवादी वैश्विक की आवाज काफी तेज सुनाई दे रही है। के पैरवोकारों ने बाजार व्यवस्था के ‘ माया जाल’ में लगातार अपना विश्वास प्रकर किया है। आलोचक इसे एक घोर विपत्ति के रूप में दखत हैं। सब बड़ी विडंबना यह है कि इस बहस की विषयवस्तु में भारत कौ आम जनता स स्वाधत समस्याएँ एवं मुद्दे कहीं गुम हो गए हैं

जैसे कि हम जानते हैं कि भारत की इस धरती पर अनेकों संघर्ष एवं विद्रोह हुए हैं या फिर हम यह भी कह सकते हैं कि भारत ने अनेक संकट कौ स्थितियों का सामना किया है। यह संकट संपूर्ण आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर भले ही नहीं दिखा हो पर रोजमर्रा की जिंदगी मैं तो यहाँ के लोग कई तरह की समस्याओं का सामना करते ही रहते हैं। आबादी के एक बड़े तबके (यद्यपि गरीबी रेखा से नौचे रहने वाले लागा की संख्या 48 प्रतिशत ही है) के अंदर आर्थिक वंचना (कगाली) अपने चर्म पर है जो उनकी आजीविका एवं रोजी-रोटी के लिए भी दिन-प्रतिदिन एक संकट को दर्शा रहा है। इस प्रकार यहाँ से देखने पर पता चलता हैं कि औपनिवेशिक शासन से मिलो आजादी के 50 वर्ष बीत जाने के बाद भी भारत अपनी आबादी के बहुसंख्यक भाग की मुलभृत आवश्यकताओं को भी पुरा कर पाने मेँ अक्षम हो है। गरीबों के पास न तो रहने के लिए घर हैं न ही स्वास्थ्य-सुरक्षा एवं शिक्षा कौ सुविधाएँ हो हैं। उन्हें पर्याप्त भोजन एव कपड़े तक तसौब नहीं हाते हैं। साधारण लोगों को इस देश में गरोबी, कुपोषण, अशिक्षा, या बेरोजगारी के सांख्यिकीय विवरणों की कोई जानकारी नहीं हैं और न हो वे इसे जानना चाहते हैं। तकनौकों सोच पर आधारित आर्थिक नीतियों से नागरिकों का दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है तथा वे इसे नहीं समझते हैं अत: यह एक बड़ी समस्या है।

वैश्वीकरण और नागरिक समाज(Globalization and Civil Society)

अनेक देशों में ढांचागत सुधारों का गरीब वर्ग के लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ा है, इसलिए यह सोचा गया था कि मध्य ।99। से लागू होने वालो सुधार प्रक्रिया का गरीबों पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ेगा। संवृद्धि के लाभ स्वाभाविक रूप से र्सि-रिस कर गरौबों तक उहाँ पहुँचे। जोसफ स्टिगलिटूज (Joseph Stiglitz) का मत है कि संवृद्धि से गरीबों को लाभ होना जरूरी तहों है और उन्हें इसका लिए बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती. है। संवृद्धि से गरीबों को तब तक फायदा जहाँ पहुँचता जब तक कि गरीबी निवारण नीतियाँ अपनायी नहीं जाती, लेकिन जगदीश भगवती , टी.एन. श्रीनिवासन और दीपक लाल कौ समझ कुछ और ही है। इनका तर्क है कि भारत में ।99। से लागू किए गए आर्थिक सुधारों से आर्थिक संवृद्धि दर में महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ है जिसके फलस्वरूप गशैबी में कमी हुई है। तथापि वे आय की असमानता पर सीधी-सीधी टिप्पणी नहीं करते। ये अर्थशास्त्री सावधानी के साथ प्रासंगिक आँकड्डों का विश्लेषण करना भी जरूरी नहीं समझते। एस.पी. गुप्ता तथा सुन्दरम व तेन्दुलकर के गरीबी के अनुमानों से स्पष्ट है कि 1990 के दशक में ग्रामीण भारत में गरीबी बढ़ी है जबकि शहरी क्षेत्र में इसमें थोड़ी कमी हुई है। यदि संपूर्ण देश की स्थिति पर एक साथ विचार किया जाए तो गरीबी की व्यापकता में कुछ वृद्धि ही हुई है। राष्ट्रीय सेंपिल सर्वेक्षण के 6।वें दौर में गरीबी के संबंध में वर्ष 2004-05 के लिए दो अलग-अलग. विधियों द्वारा अनुमान दिए गए हैं। ये विधियाँ हैं

(1) समान याददाश्त अवधि (Uniform recall period), तथा (॥) मिश्रित याददाश्त अवधि (Mixed recall period)। समान याददाश्त अवधि के आधार पर तैयार आँकड़ों के अनुसार, 1993-94 में 36. 0 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी जबकि 2004-05 में 27.5 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी| मिश्रित याददाश्त अवधि के आधार पर तैयार आँकड़ों के अनुसार, 1999-2000 में 26| प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी जबकि 2004-05 में 21.8 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी

What is Globalization – वैश्वीकरण का क्या अर्थ है

 

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